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सीबीआई जांच के पहले भ्रष्टाचार के गवाहों को हटाया गया : सीआईपी सुरक्षाकर्मी

कांके। केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान (सीआईपी) में 156 निजी सुरक्षाकर्मियों को नौकरी से हटाने का मामला अब गंभीर आरोप-प्रत्यारोप के बीच राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बनता जा रहा है। बीते 3 फरवरी से सीआईपी परिसर में आंदोलनरत सुरक्षाकर्मी मंगलवार को 44 वें दिन प्रेस वार्ता कर प्रशासन, वरिष्ठ अधिकारियों और कथित राजनीतिक संरक्षण पर तीखा हमला बोला। सुरक्षाकर्मियों ने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार की पोल न खुले, इसलिए सुनियोजित तरीके से 156 गार्डों को नौकरी से बाहर निकाल दिया गया। बताया कि संस्थान में एजी की रिपोर्ट के आधार पर पूर्व में हुए सिक्योरिटी घोटाले की जांच के लिए सीबीआई की टीम आने वाली है। हम सभी गार्ड्स ही ठगी और लूट के शिकार हुए थे। संस्थान के तत्कालीन निदेशकों और अधिकारियों की मिलीभगत से एक ही एजेंसी ने 30 साल से अधिक समय तक कार्य किया। उसने न्यूनतम मजदूरी, बोनस, ईपीएफ, ओवरटाइम, अवकाश आदि की राशि का भुगतान ही नहीं किया। उस प्रकार करोड़ों का घोटाला किया गया। इसके विरुद्ध लेबर कोर्ट जाने और हममें से 60 गार्ड्स को मात्र छह माह के लिए एक एक लाख का मुआवजा निर्धारित किया गया। उस पैसे को एसआईएस और सीआईपी प्रशासन को देना है। इसके पहले ही हम गवाह गार्ड्स को नौकरी से निकाल बहार किया गया ताकि यह भ्रष्टाचार दब जाए। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत उन्हें नौकरी गंवाकर चुकानी पड़ी। प्रेस वार्ता में सुरक्षाकर्मियों ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि डॉ. तरुण कुमार, मनोज कुमार वर्मा, डॉ. बीके चौधरी, पंकज कुमार और डीजीएचएस के कुछ अधिकारी मिलकर  सीआईपी को ‘पैसा कमाने का अड्डा’ बना चुके हैं। उन्होंने इन सभी की भूमिका की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की। पूर्व निदेशक डॉ. तरुण कुमार पर निशाना साधते हुए सुरक्षाकर्मियों ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों के बावजूद उन्हें उसी मामले में नोडल अधिकारी बना दिया गया, जो पूरी जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। जिस पर आरोप है, वही जांच का प्रभारी यह कैसे संभव है? उन्होंने सवाल उठाया। वित्तीय अनियमितता के एक अन्य मामले को उजागर करते हुए गार्ड्स ने बताया कि संस्थान में शिवा

 प्रोटेक्शन फोर्स को वर्ष 2024 में अप्रैल से हाउसकीपिंग का कार्य 3.85 प्रतिशत की दर से मिला था। लेकिन उनके टेंडर को जुलाई माह में समाप्त कर दिया गया। इसके बाद बिना एजेंसी के संस्थान ने सफाईकर्मियों को आठ माहवटक बिना भुगतान किए ही कार्य करवाया। अप्रैल 2025 में डबल ए एजेंसी को हाउसकीपिंग का टेंडर मिला। लेकिन आठ माह का पैसा संस्थान द्वारा 2025 में भी नहीं दिया गया। 2025 के अंत से 26 मार्च के बीच बकाया पैसे का भुगतान उसी शिवा प्रोटेक्शन फोर्स से करवाया गया जिसने सेवा ही नहीं दी थी। आश्चर्यजनक बात यह है कि एजेंसी को 4.85 प्रतिशत की दर से पैसे का भुगतान कर लाखों का फायदा पहुंचाया गया। गार्ड्स ने पूर्व निदेशक डॉ तरुण कुमार और मौजूदा निदेशक डॉ वीके चौधरी ने मिलीभगत कर यह भ्रष्टाचार किया है। इसकी उच्चस्तरीय जांच आवश्यक है। सुरक्षाकर्मियों ने यह भी आरोप लगाया कि उनसे भी 40 से 50 हजार रुपये तक की अवैध वसूली की जा रही थी। विरोध करने पर उन्हें बाहर कर दिया गया। 100 साल पुराने इस प्रतिष्ठित संस्थान की जमीनी हकीकत पर भी सवाल उठे हैं। सुरक्षाकर्मियों ने बताया कि रोजाना 500-600 मरीज और उनके साथ सैकड़ों की संख्या में अभिभावक आते हैं। लेकिन सीआईपी आने वालों को पीने के स्वच्छ पानी, ठहरने, भोजन जैसी बुनियादी सुविधाओं का गंभीर अभाव झेलना पड़ता है।आंदोलनकारियों ने कहा कि उन्होंने स्वास्थ्य महानिदेशालय को लिखित शिकायत दी है, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधियों के चुप रहने पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जनता के मुद्दे पर नेताओं को आगे आकर सच्चाई देखनी चाहिए। कहा कि भाजपा के किसी सांसद के पास हमारी पीड़ा सुनने तथा संस्थान की सच्चाई को स्थल पर आकर समझने तक की फुर्सत नहीं है। इससे बड़ा दुर्भाग्य जनता का कुछ दूसरा नहीं हो सकता है। सुरक्षाकर्मियों ने चेतावनी दी है कि जब तक पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं होती 156 निजी सुरक्षाकर्मियों को नौकरी में पुनः बहाल नहीं किया जाता है और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होती, उनका अनिश्चितकालीन आंदोलन जारी रहेगा।

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