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जयपाल सिंह मुंडा की 123वीं जयंती आज, पैतृक गांव टकरा अब भी बदहाली में


मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा की 123वीं जयंती आज मनाई जा रही है। इस अवसर पर जहां पूरे झारखंड में उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया जा रहा है, वहीं उनका पैतृक गांव टकरा आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बदहाली का जीवन जीने को मजबूर है। वर्ष 2015 में गांव को आदर्श गांव बनाने की घोषणा हुई थी, लेकिन दस साल बाद भी विकास उम्मीद के अनुरूप नहीं हो पाया।

आदर्श गांव की घोषणा, अधूरा विकास

पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जयपाल सिंह मुंडा के पैतृक गांव टकरा को गोद लेकर आदर्श गांव बनाने की घोषणा की थी। इसके बाद गांव में मिनी हॉकी स्टेडियम, पंचायत सचिवालय, अस्पताल भवन, सोलर आधारित पेयजल जलमीनार, मिनी जिम और पीसीसी सड़क जैसे कुछ कार्य जरूर कराए गए। गांव के प्रवेश द्वार पर जयपाल सिंह मुंडा की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।
हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि कई योजनाएं अधूरी हैं। मिनी हॉकी स्टेडियम की स्थिति इतनी खराब है कि वहां हॉकी खेलना संभव नहीं है, केवल फुटबॉल ही खेला जा रहा है। समाधि स्थल की रंगाई-पुताई भी पिछले दो वर्षों से नहीं हुई है और दीवारें काली पड़ चुकी हैं।

जयंती पर श्रद्धांजलि और कार्यक्रम

जयपाल सिंह मुंडा की जयंती के अवसर पर उनके पैतृक गांव टकरा में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। सांसद कालीचरण मुंडा, विधायक राम सूर्या मुंडा, पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा, पूर्व विधायक नीलकंठ सिंह मुंडा सहित कई जनप्रतिनिधि गांव पहुंचकर समाधि स्थल पर श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ फुटबॉल और अन्य खेल प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रमों को लेकर ग्रामीणों में खासा उत्साह देखा जा रहा है।

घोषणाएं आज भी अधूरी: जयंत जयपाल सिंह मुंडा

जयपाल सिंह मुंडा के पुत्र जयंत जयपाल सिंह मुंडा ने कहा कि हर जयंती पर घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने में वर्षों लग जाते हैं। उन्होंने बताया कि गांव में शिक्षा व्यवस्था बेहद कमजोर है, इसलिए वे स्वयं और उनका परिवार बच्चों को पढ़ाने में सहयोग करता है। जयपाल सिंह मुंडा के नाम से चल रही स्कॉलरशिप योजना को उन्होंने बेहतर बताया, लेकिन कहा कि इसका लाभ झारखंड के सिर्फ 15–20 आदिवासी बच्चों तक ही सीमित है। विकास के मामले में गांव आज भी काफी पीछे है।

मरांग गोमके की विरासत

जयपाल सिंह मुंडा खूंटी संसदीय क्षेत्र से पहले सांसद रहे और लगातार पांच बार संसद पहुंचे। वे भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे और 1928 के ओलंपिक में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाले खिलाड़ी बने। वे संविधान सभा के सदस्य भी रहे और जल-जंगल-जमीन तथा आदिवासी अधिकारों की मजबूती से पैरवी की।
3 जनवरी को उनकी जयंती न केवल एक महान खिलाड़ी और नेता को याद करने का दिन है, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान, संघर्ष और अधिकारों की प्रेरणादायक विरासत को नमन करने का अवसर भी है।

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